Friday, September 12, 2014

                                                 

                            बस थोड़ा सा बदलाव चाहिये 



फांसी  के तख़्त पर  शांत और निडर भाव  से  खड़े एक व्यक्ति के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी थी। एक मुस्कान के साथ गुनगुना  रहा  था-


                             सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है   

                            देखना है जोर कितना बाजुए कातिल  में है                                                                                                 वन्दे मातरम 


युवक का शरीर  फंदे झूल  गया। वो थे भगत  सिंह भला  उनका कसूर क्या था। क्या बस इतना ही  की  वो देश को  गुलामी से आजाद कराने की तमन्ना  रखते  थे। वो तो देश की  आजादी के लिए शहीद  हो गए।  पर क्या हम  आजाद   है? बात कुछ  अजीब सी है पर है  सौ टके  का सच।


मैं  बात कर रहा  हूँ भ्रष्टाचार की।भारत के अंदर किसी भी क्षेत्र में जाए भरष्टाचार का फैलाव  और उसकी जकड़ साफ़ दिखाई  देती है  भारत  के सरकारी व गैर सरकारी व गैरसरकारी विभाग भी  भ्रस्टाचार  से  अछूते  नही
है। अपना काम कराने के  लिए  रिशवत देनी पड़ती  हैं। मंत्री हो या संतरी  फाइल आगे  करानी हो  तो भी कुछ पैसे उन्हें दीजिये।


स्कूल ,कॉलेज भी नही है अछूते 

स्कूल,कॉलेज भ्रस्टाचार   अछूते  नहीं  है। फर्क बस  इतना  है इनके  तरीके  अलग  है। वो  गरीब बच्चे  जो कुछ कर दिखाने  का सपना रखते  है उनके रिस्वत  आड़े आ जाती  है। कहते  है सपने  उन्ही के पूरे  होते है जो कुछ कर  दिखाने की तमन्ना  रखते  है। पर आज भ्रस्टाचार के इस  युग  में सबके सपने अधूरे जाते  है ये  सब  बातें निअर्थक  और  खोखली लगती   है।

बदलाव मांगती बैंक 

अर्थववस्था का आधार स्तंभ माने  जाने वाले बैंकों  भी  भ्रस्टाचार के  रोग  से अछूते  नही हैं। आप किसी प्रकार के लोन के  लिए  आवेदन  करें तो  बिना  किसी परेशानी  के फाइल निकल जाये ये नही।

पुलिस का  क्यों है ये रवईया   

 देश की आंतरिक व्वयवस्था का भार पुलिस पर होता  है पर वे भी रिशवत  लेकर  गुनाहगारो  को छोड़ देते है।  क्या ये  गुनाह को बढ़ावा देना नही है ?

 इंसान की प्रवत्ति होती है वहां सफाई  से  रहता  है तो वो भ्रस्टाचार जैसी बुराई  को  साफ  कर  समाज में   क्यों  नहीं रहता ?

सावल है की हम भ्रस्टाचार  मिटाये  कैसे? ज्यादा  तर लोग कहेंगे " आसान नही है क्युकि इंसान बुरा है   " मेरा  मानना  है  इंसान  जन्म बुरा से  नही  होता है परिस्थितियाँ  उन्हें  बुरा  बनाती है।  तो हम उन परिस्थितियों को क्यों नही  बदलते ?अपनी  सोच को क्यों नही बदलते ?


 हम  सिर्फ  किसी एक व्यक्ति या  संगठन को बदल कर भ्रस्टाचार नहीं मिटा  सकते  पर  अपने  को  बदल कर समाज में बदलाव जरूर ला सकते  है।  मनोबल बड़ा के भ्रस्टाचार से दूर रहे और अपने  काम के प्रति वफादार रहना रहे ।
फ़ोटो (इंटरनेट )

Tuesday, September 2, 2014

                                      
                            
              ये कैसी आजादी है !
बेशक  हम   आजाद  है  मगर  इस आजादी के मायने क्या है \65  सालो से आजाद इस इस  देश की  पहचान  क्या है\किस्सों और  किताबों  को पीछे छोड़ कर अगर आप इस सवाल का जवाब ढूंढने निकलेंगे तो आपको दो तस्वीरें दिखाई देंगी। क्या  आपने कभी  महसूस किया है।इन  तस्वीरो को जिनमे एक तरफ तो संवरता इंडिया है और दूसरी तरफ बिलखता भारत।  

 शिक्षा के केंन्द्र में अशिक्षित-
दुनिया के नक्शे पर भारत की छवि एक उभरते एजुकेशन हब की है और यही वह भारत है जो सबसे ज्यादा अशिक्षित आबादी वाले देशों की सूची में शुमार है। 
   भारत में जिस उम्र के बच्चों को पढ़ना चाहिए वह छोटी-बड़ी दुकानों में काम करते दिख जाएंगे। अपने गरीब मां-बाप का हाथ बटाने के लिए मजदूरी करतें हैं। जिस उम्र में उनके हाथ में किताबों और खिलानों के बजाय फूल बेचते नजर आते है। उनका बचपन छिन-सा जाता है। अशिक्षा की दहलीज पर उनका कदम उन्हें भी नहीं पता।

बर्बादी और भूख-
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार कुपोशित बच्चों की संख्या के मामले मे भारत का दूसरा स्थान है।
                         इसी देश में दूसरी तस्वीर खाद्यानों के भण्डारण में भी नजर आती है। एक और भूख और कुपोसण है जहा बच्चे, बुजुर्ग भूख से तड़पते है, जहां महंगाई के कारण एक गरीब मजदूर दो वक़्त की रोटी नहीं जुटा पाता। वहीं दूसरी ओर सरकारी विभागों में अनाज सड़ता नजर आता है। भण्डारण की सही व्यवस्था न होने से खाद्यानों की बर्बादी लगातार जारी है। क्या किसी से भूख से मरने वालों की जान की कोई कीमत नहीं 
है
क्या हम सब एक है!
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देष है। जहां विभिन्न धर्म और जाति के लोग रहतें है। यहीं हर रंग हर मजहब के लोग है। राजनैतिज्ञों ने हमेशा जाति और मजहब के नाम पर खूब वोट बैंक भरे है जिन्होंने समय के साथ दंगों का रुप ले लिया। हम एक तो  है हमें अलग करने की राजनीति कर है ये राजनैतिज्ञ। हम गर्व से हमेशा कहते है,हम हिन्दु है ,मुस्लिम है,सिख है,इसाई है पर हम इतने पढे़ लिखे होने के बावजूद स्वयं को हिन्दुस्तानी कब बोलेगें ।

आजाद भारत ,गुलाम किसान-
इस देश की 60% आबादी आज भी खेती किसान पर निर्भर है। इस आबादी में पिछलें पन्द्रह सालों के आत्महत्या के आकड़े 2,50,000 की संख्या पार कर चुके है।
                        यहां किसानों को अपनी कृशि के लिए कर लेना पड़ता है। जहां तक है बिना कर के 70% किसान खेती करने में असमर्थ है। करीब 40 -50 साल से राश्ट्रीकृत बैंक और एजेंसी कर दे रहीं है। साकार का मूल उद्देश्य बैंकों द्वारा लोगों के सोशल अपलिफमेन्ट में सहभागीदार बनना और विषेशकर किसानों को साहूकारों से छुटकारा दिलाना था, परन्तु इतने साल बीतने के बाद भी किसान साहूकारों के चंगुल से नहीं मुक्त हो चुके।